28.1.12

माँ सरस्वती



तूने दिया है प्यार माँ
स्वीकार कर आभार माँ

माता-पिता कोई नहीं
बस तू ही है आधार माँ

मेरा नहीं तेरा ही है
जो कुछ भी है घर-बार माँ

कोई न था बस तू ही थी
जब था बहुत लाचार माँ

आशीष दे लड़ता रहूँ
जितना भी हो अंधियार माँ

फिर फूल सरसों के खिले
आ मूर्त हो इस बार माँ

छू लूँ चरण इक बार मैं
भव से मुझे अब तार माँ

................

विशेषः बसंत पंचमी चाहे 9 फरवरी, 1962 को आये चाहे 28 जनवरी 2012 को, है तो जन्म दिन !

(चित्र गूगल से साभार)

22.1.12

ढाई बाई चार फुट की चौकी



ढाई बाई चार फुट की चौकी
जिसके चारों तरफ लगे हैं
हर कोनों पर उठे लकड़ी के मुठ्ठों से जुड़ी
अलमुनियम के रॉड की रेलिंग
एक बच्चे के
रात में सोते समय
बिस्तर से गिरते रहने की चिंता का परिणाम
सुरक्षित पलंग।
                   
चौकी में रेलिंग नहीं है
कट चुके हैं लकड़ी के मुठ्ठे
बड़ा हो चुका है बच्चा
अब नहीं सो सकता चौकी पर
प्राचीन पलंग पर बैठकर
अब वह
रोज सबेरे
पढ़ता है अखबार
रगड़ता है चंदन
(ताखे पर विरासत में बैठे ठाकुर जी के लिए)
खाता है
दाल-भात
रात
देर से आने पर
वहीं ढकी मिल जाती है उसे
रोटी-सब्जी भी।

जगते हैं भाग
घूरे के भी
सनमाइका जड़ा है
ढाई बाई चार फुट की चौकी में !
जिसके इर्द गिर्द
लोहे की चार कुर्सियों पर बैठकर
दोस्तों के साथ
अब वह
शान से पी रहा है
चाय


एक दिन
दफ्तर से लौटकर
देखता है 
सदन बढ़ई जोड़ रहा है
चार पैर
ढाई बाई चार फुट की चौकी में
चौकी
अब नहीं रही चौकी
बन चुकी है
डाइनिंग टेबुल !
उसके इर्द-गिर्द
रखी हैं
चार नई प्लॉस्टिक की कुर्सियाँ
जिस पर बैठकर
वह और उसका परिवार 
एक साथ कर सकते हैं भोजन
खुश हो
कहती है उसकी पत्नी...
एक कुर्सी और लाइये न !
ताकि साथ बैठ सके
छुटकी भी।

डाइनिंग टेबुल की जुड़ी टांगों पर
उभर आये रंग
खुद ही कहते हैं
अपनी
राम कहानी

अकेले में
जब कोई नहीं होता कमरे में
बहुत ध्यान से   
सुनता रहता है वह
ढाई बाई चार फुट की चौकी और
डाइनिंग टेबल के बीच की
बातचीत
और.... 
ट्यूबलाइट की रोशनी
नाक पर चढ़े चश्मे को देखकर  
समझती है
कि वह अभी
अखबार पढ़ रहा है।
...................................................

17.1.12

अधिकारी

एक सरकारी बाबू ने
ज्योतिष को अपना हाथ दिखाया
पूरा एक सौ एक  चढ़ाया
और पूछा...
बाबा !
मैं हूँ एक अदना सा कर्मचारी
बोलिए !
कब होगी तरक्की ?
कब बनुँगा अधिकारी ?

बाबा मुस्कुराए
बोले...
बिलकुल ठीक समय पर आए
आप शीघ्र ही बनेंगे
उच्चाधिकारी
आपके अण्डर में होंगे
तीन-तीन अधिकारी
यात्रा के लिए मिलेगी
बड़ी सी सवारी
एक दिन
जनता करेगी आपका सम्मान
भीड़ की शक्ल में आकर
देगी
भरपूर दान !

सुनते ही वह
बाबा के चरणों में
नतमस्तक हो गया
उठा
तो उनके भारी तोंद की तरह
गदगद हो गया

बाबा थे महान
बाबा थे ज्ञानी
सोलह आने सच हुई
उनकी भविष्यवानी
दूसरे दिन ही आ गया
सरकारी फरमान
आपको कराना है
चुनाव में मतदान
आप हैं
लोकतंत्र के
सर्वोच्च पीठ पर आसीन
जी हाँ !
बना दिए गये हैं
पीठासीन !

आपके अण्डर में हैं
तीन-तीन मतमान अधिकारी
और बूध तक ले जाने के लिए
ट्रक की सवारी

आदेश पढ़ते ही
उसका ह्रदय तार-तार हो गया
दौड़कर
बाबा के सीने पर सवार हो गया
बोला..
बाबा !
आपने यह क्या कर दिया ?
मांगा था वरदान
श्राप दे दिया !!

बाबा हँसते हुए बोले..

अधिकार सिर्फ
मजे लूटने का नाम नहीं है
वह अधिकारी क्या
जिसे कर्तव्य का ज्ञान नहीं है !

जाइये
ठीक से चुनाव कराइये
समय से जाइये
समय से आइये
कर्तव्य से यूँ न घबड़ाइये
बीच में
उड़न छू
न हो जाइये

किस्मत से मिली है
यह जिम्मेदारी
अब आपको दिखाना है
कि आप हैं
एक अच्छे अधिकारी।
.............................

15.1.12

बनारस की छत और पतंगबाजी














पतंग

आवा राजा चला उड़ाई पतंग ।

एक कन्ना हम साधी
एक कन्ना तू साधा
पेंचा-पेंची लड़ी अकाश में
अब तs ठंडी गयल
धूप चौचक भयल
फुलवा खिलबे करी पलाश में

काहे के हौवा तू अपने से तंग । [आवा राजा चला...]

ढीला धीरे-धीरे
खींचा धीरे-धीरे
हम तs जानीला मंझा पुरान बा
पेंचा लड़बे करी
केहू कबले डरी
काल बिछुड़ी जे अबले जुड़ान बा

भक्काटा हो जाई जिनगी कs जंग । [आवा राजा चला...]

केहू सांझी कs डोर
केहू लागेला अजोर
कलुआ चँदा से मांगे छुड़ैया
सबके मनवाँ मा चोर
कुछो चले नाहीं जोर
गुरू बूझा तनि प्रेम कs अढ़ैया

संझा के बौराई काशी कs भंग। [आवा राजा चला...]
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बाल सखा,  जिन्होने हमें पतंगबाजी का न्यौता दिया, वे तो एक कटोरा भांग छानकर टुन्न पड़े थे। छत पर चढ़ने लायक भी नहीं।




14.1.12

वयोवृद्ध साहित्यकार, विवेकी राय, जगतगुरू रामानन्दाचार्य पुरस्कार से सम्मानित



आज 14 जनवरी 2012 को वाराणसी में श्री मठ की शाखा, श्री बिहारम, बड़ी पियरी स्थित अमरा बापू सभागार में जगतगुरू रामानन्दाचार्य की 713 वीं जयंन्ती मनाई गई। इस अवसर पर वाराणसी के पंचगंगा घाट स्थित श्री मठ के आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी और गोपाल मंदिर प्रसिद्ध वैष्णव पीठ के आचार्य आदरणीय श्याम मनोहर जी महाराज मुख्य अतिथि के रूप में मंच पर विराजमान थे। इस अवसर पर जगतगुरू रामानंदाचार्य और भक्ति प्रस्थान आंदोलन विषयक विद्वत् संगोष्ठी और डा0 पव नाथ द्विवेदी जी की संस्कृत भाषा में अनुदित पुस्तक के लोकार्पण के साथ साथ विशिष्ट कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ साहित्यकार श्री विवेकी राय जी का सम्मान समारोह भी आयोजित था।

अक्षरब्रह्म के आराधक, भोजपुरी के भगीरथ, वयोवृद्ध साहित्य कार विवेकी राय जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जब डा0 उदय प्रताप सिंह जी ने बताया कि आज कबीर चौरा में विवेकी राय जी का सम्मान समारोह आयोजित है तो एक खुशी की लहर दौड़ गई। उनका बनारस में होना और सम्मान समारोह के आयोजन की खबर इतनी महत्वपूर्ण थी कि मैं वहां दौड़ा चला गया।


काशी के वरिष्ठ साहित्यकारों तथा श्रीमठ परिवार की उपस्थिति में आयोजित इस सम्मान समारोह में पूर्ण वैदिक रीति से तिलक चंदन लगाकर, विवेकी राय जी को एक लाख रूपये का जगतगुरू रामानन्दाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रमुख वक्ता के रूप में आचार्य कमलेश दत्त त्रिपाठी और वंशीधर त्रिपाठी जी उपस्थित थे।

आयोजन की कुछ तश्वीरें खीची और विवेकी राय जी का भाषण भी अपने मोबाइल में टेप कर घर ले आया। शोर में आवाज इतनी साफ नहीं है कि पॉडकास्ट लगाया जाय और उसे आपको सुनाया जाय। जो कर सकता था वह यह कि सुनकर उनका भाषण ज्यों का त्यों यहां प्रकाशित कर रहा हूँ।








पुरस्कार प्राप्त करने के पश्चात इस अवसर पर बोलते हुए विवेकी राय जी ने कहा... 



इस जगतगुरू के पवित्र पीठ का यह आशीर्वाद है। कृपा है जो पहुँच पाया। मुझे लगता था कि पहुंज पाउंगा कि नहीं। खड़ा भी हो पाउंगा कि नहीं । लेकिन आप तो ईश्वर तुल्य हैं। आपकी शक्ति से ही जो कुछ हुआ, वह हुआ है। सच पूछिये तो मैं तो साहित्यकार हूँ लेकिन मेरे पास कार नहीं है। हाँ, एक कार है। अहंकार की कार... कि मैं साहित्यकार हूँ। लेकिन उस अहंकार को आज मैं गाजीपुर छोड़ कर आया हूँ। आज यहां मैं जगतगुरू रामानन्दाचार्य द्वारा और उनके पद प्रतिष्ठित साहबों का कृपा पात्र बनकर, उनका पात्र बनकर आया हूँ। भक्त बनकर आया हूँ। सम्मान तो बहुत मिले लेकिन ऐसे प्रातः स्मरणीय, पुन्यशील, पवित्र हाथों का पुरस्कार बहुत दुर्लभ है और यह दुर्लभ मुझे आज मिला। सन 2000 में जगतगुरू रामानन्दाचार्या के सर्वोच्च ज्ञानपीठ समारोह का आयोजन गाजीपुर में हुआ था । गाजीपुर में महाराज का आगमन हुआ। वहां गाजीपुर के विशिष्ट लोगों को महाराज ने प्रशस्तिपत्र दिया। मुझे कुछ मिला नहीं। लेकिन जिस प्रेम से स्वामी जी मिले मैने कहा इससे अच्छा क्या हो सकता है। एक घटना हुई आपने मुझे रामनामी ओढ़ा दिया। ओढ़कर मैं बैठ गया। इसके बाद उन्होने मुझसे कहा कि एक बढ़िया शाल ओढ़ा दो..रामनामी हट गई। शाल ओढ़ा दिया गया। मैने समझा कि अभी वैराग्य लायक नहीं हूँ, घोर संस्कारी हूँ।  रामनामी के योग्य नहीं हुआ हूँ। अब 87 वर्ष की उम्र में अब क्या चाहते हैं महाराज जी ? एक लाख रूपिया देकर कहां ले जायेंगे..! हा..हा..हा..

यह गद्दी 15 वीं शताब्दि से लेकर भक्ति की जो जोत जला रही है, वह जलती रहेगी और अनंत काल तक जलती रहेगी। स्वामी रामानंदाचार्य एक नाम नहीं है वरन एक शक्तिशाली उर्जा की लहर है जो समय के साथ समाप्त नहीं हो जाती समय के साथ इसका प्रभाव और बढ़ता जाता है, बढ़ता रहा है ...तमाम-तमाम क्रांतिकारी कदम हुए वे अद्धभुत हैं।

भारत उन्नति करतेकरते प्रगतिशील आंदोलन तक आया है। और वैसा प्रगतिशील आंदोलन आचार्य रामानंद जी द्वारा 15 वीं, 16वीं शताब्दि में ही खड़ा कर दिया गया था। इनके शिष्य परम्परा में ऐसे शिष्य नहीं हैं जिनका साहित्य, उनके जीवन काल में ही बुझ जाय बल्कि समय के साथ और भी प्रभावी रूप में बढ़ता जाता है, लोगों के मन मस्तिष्क पर  छाता जाता है। कितने चाव के साथ आज कबीर को पढ़ाया जाता है! और कितने गर्व से कहा जाता है कि रामानंद जी ने एक ऐसा अग्नि धर्मी शिष्य दिया जिसके एक एक दोहे में, एक एक शब्दों मे जैसे क्रांति की चिंगारी है! और वह साहित्य की, धर्म की, चाहे कहीं..कोई भी शाखा हो वह सर्वत्र स्वीकृत है जिसका सृजन सर्वत्र समादृत है। सृजनवादियों में..जनवादियों में भी वह समादृत है। वह प्रेम के गीत गाता है। वह विरह के गीत भी गाता है। वह कुल्हाड़ा लेकर घर भी खोदता है।  तुलसी दास जी भी उसी स्रोत से आये। सही बात तो यह है कि इसका बड़ा श्रेय रामानंदाचार्य जी को जाता है। यह रामानंद जी की अत्यंत पवित्र गद्दी है। यह पुरष्कार जो मुझे मिला, इससे मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मैं अधिक कहने की स्थिति में नहीं हूँ, थक गया हूँ, सभी को प्रणाम करता हूँ।



कुछ और चित्र काशी के वरिष्ठ साहित्यकार.....








सभा का कुशल संचालन और आये विद्वानों का सम्मान प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक डा0 उदय प्रताप सिंह जी ने (बीच में जैकेट पहने)  किया...




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मकर संक्रांति

प्रस्तुत पोस्ट आनंद की यादें से उद्धरित है, उनके लिए जिन्होने इसे नहीं पढ़ा। आप सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं। 


मकर संक्रांति का त्योहार ज्यों-ज्यों करीब आता त्यों-त्यों पक्के महाल के घरों की धड़कने तेज होती जातीं। बच्चे पतंग उड़ाने की चिंता में तो माता-पिता बच्चों की चिंता में दिन-दिन घुलते रहते। कमरे में लेटो तो यूँ लगता कि हम एक ऐसे ढोल में बंद हैं जिसे कई एक साथ पीट रहे हैं। अकुलाकर छत पर चढ़ो तो बच्चों की पतंग बाजी देखकर सांसें जहाँ की तहाँ थम सी जातीं। तरह-तरह की आवाजें सुनाई देतीं....अरे...मर जैबे रे.s..s..गिरल-गिरल..s..s..कटल-कटल.s..s..बड़ी नक हौ..!..आवा, पेंचा लड़ावा.....ढील दे रे.s..ढील दे.s..खींच के.s..भक्काटा हौ...। जिस दिन पिता जी की छुट्टी होती उस दिन आनंद के लिए घर पर पतंग उड़ाना संभव नहीं था। उस दिन वह श्रीकांत या दूसरे दोस्तों के घरों की शरण लेता मगर जब पिताजी नहीं होते आनंद खूब पतंग उड़ाता। हाँ, मकर संक्रांति के दिन सभी को अभय दान प्राप्त होता था। आनंद के घर की छत के ठीक पीछे दूसरे घर की ऊँची छत थी। जब कोई पतंग कट कर आती तो वहीं रह जाती। उस पतंग को लूटने के चक्कर में आनंद बंदर की तरह उस छत पर चढ़ता। जरा सा पैर फिसला नहीं कि तीन मंजिल नीचे गली में गिरने की पूरी संभावना थी। उस छत पर चढ़ते आनंद के भैया उसे देख चुके थे। सख्त आदेश था कि पतंग लूटने के चक्कर में वहाँ नहीं चढ़ना है मगर पतंग लूटने का मोह आनंद कभी नहीं छोड़ पाता। यह तो किस्मत अच्छी थी कि कभी गिरा नहीं वरना कुछ भी हो सकता था।

यूँ तो भारत के सभी प्रांतों में अलग-अलग नाम से इस त्योहार को मनाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से स्नान-दान पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। प्रयाग का प्रसिद्ध माघ मेला भी इसी दिन से प्रारंभ होता है। सूर्य की उपासना का यह त्यौहार हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाला त्योहार है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। दिन बड़े व रातें छोटी होती जाती हैं। माना जाता है कि भगवान भाष्कर शनि से मिलने स्वयंम् उनके घर जाते हैं। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं इसलिए इसे मकर संक्रांति के नास से जाना जाता है। गंगा स्नान के  पश्चात खिचड़ी दान व खिचड़ी खाने का चलन है। इस दिन की (उड़द की काली दाल से बनी) खिचड़ी भी साधारण नहीं होती वरन एक विशेष पकवान, विशेष अंदाज में खाने का दिन होता है जिसे उसके यारों के साथ खाया जाता है। लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है... खिचडी के हैं चार यार । दही, पापड़, घी, अचार।। इसलिए इसे खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। त्योहार से पूर्व ही विवाहित बेटियों के घर खिचड़ी पहुँचाने के अनिवार्य सामाजिक बंधन से भी इस पर्व के महत्व को समझा जा सकता है। इस त्योहार को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है इसलिए यह हर वर्ष 14 जनवरी के दिन ही मनाया जाता है।  

मकर संक्रांति ज्यों-ज्यों करीब आता त्यों-त्यों पतंगबाजी का शौक परवान चढ़ता। गुल्लक फूट जाते। एक-एक कर सभी बड़ों से मंझा-पतंग खरीदने के पैसे मांगे जाते। खिचड़ी से एक दिन पहले जमकर खरीददारी होती। देर शाम तक नये खरीदे गये पतंगों के कन्ने साधे जाते। थककर जब बच्चे सोते तो नींद में भी पंतगबाजी चलती रहती। दूसरी तरफ पिताजी अपनी खरीददारी में परेशान रहते। बड़ों के लिए यह पर्व जहाँ धार्मिक-सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता वहीं बच्चों के लिए इसका महत्व मात्र पतंगबाजी और तिल-गुड़ के लढ्ढू खाने तक ही सीमित था। इस दिन के लिए जहाँ पिताजी जप-तप, दान-स्नान  की तैयारी में व्यस्त रहते वहीं माता जी बच्चों के लिए तिल-गुड़ के लढ्ढू, चीनी खौलाकर उसके शीरे में मूंगफली के दाने की पट्टी बनाने में लगी रहतीं। आनंद वैसे तो नित्य गंगा स्नान करता मगर आज के दिन पतंगबाजी के चक्कर में नहाने में भी समय जाया नहीं करना चाहता था। बिना स्नान किये भोजन तो क्या एक लढ्ढू भी छूने की इजाजत नहीं थी वरना संभव था कि वह पूरे दिन बिना स्नान के ही रह जाता।

इधर सुरूज नरायण रेती पार से निकलने की तैयारी करते उधर आनंद आकाश ताक रहा  होता। उसे बस प्रतीक्षा इस बात की होती कि कहीं आकाश में एक भी पतंग उड़ते दिख जाय । सूर्य का उगना नहीं, पतंग का आकाश में दिखना मकर संक्रांति के आगाज का संकेत होता। धूप निकलने तक तो समूजा बनारस आनंद के इस महापर्व में पूरी तरह डूब चुका होता। क्या किशोर  ! क्या युवा ! सभी अपनी-अपनी पेंचें लड़ा रहे होते। हर उम्र के लिए यह त्योहार गज़ब की स्फूर्ती प्रदान करने वाला होता। वृद्ध धार्मिक क्रिया कलापों में तो किशोर पतंग बाजी में मगन रहते । सबसे दयनीय स्थिति माताओं की होती। एक ओर तो वे अपने पति देव के धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्णाहुती देतीं वहीं दूसरी ओर बच्चों की चिंता में दिन भर उनकी सासें जहाँ की तहाँ अटकी रहतीं। युवा पतंग के पेंचों के साथ-साथ दिलों के तार भी जोड़ रहे होते। जान बूझ कर दूर खड़ी षोड़शी के छत पर पतंग गिराना और न तोड़ने की मन्नत करना बड़ा ही मनोहारी दृष्य उत्पन्न करता । ऐसे दृष्यों को देखकर कहीं सांसे धौंकनी की तरह तेज-तेज चलने लगती तो कहीं लम्बी आहें बन जातीं। वे खुश किस्मत होते जो किसी बाला से पतंग की छुड़ैया भी पा जाते।  

सूर्यास्त के समय का दृष्य बड़ा ही नयनाभिराम होता। समूचा आकाश रंग-बिरंगे पतंगों से आच्छादित। जिधर देखो उधर पतंग। पतंग ही पतंग। दूर गगन में उड़ते पंछी और पतंग में भेद करना कठिन हो जाता। पंछिंयों में घर लौटने की जल्दी। पतंगों में और उड़ लेने की चाहत। लम्बी पूंछ वाली पतंग। छोटी पूंछ वाली पतंग। काली पतंग। गुलाबी पतंग। कोई पतंगबाज फंसा रहा होता पतंग से पतंग तो कोई पतंगबाज लड़ा रहा होता पतंग से पतंग । कोई कटी पतंग सहसा पा जाती सहारा। थाम लेती उसका हाथ उसके आगे-पीछे घूमती दूसरी मनचली पतंग। कोई दुष्ट ईर्ष्या वश खींच लेता उसकी टांग। शोहदे चीखते ...भक्काटा हौ.....हो जाती वह...फिर से कटी पतंग। गिरने लगती बेसहारा दो कटी पतंग। सहसा खुल जाता किसी अभागे का भाग। थाम लेता एक की डोर। खींची चली आती दूसरी भी, पहली के संग। लम्बी होने लगतीं परछाईयाँ । गुलाबी होने लगता समूचा शहर । पंछियों मे बदल जाते सभी पतंग सहसा। गूँजने लगती चहचहाहटें। छतों से उतरकर कमरों में दुबकने लगते बच्चे। चैन की सांस लेता थककर निढाल हुआ दिन। खुशी से झूमने लगता चाँद। सकुशल हैं मेरे आँखों के तारे !       
............................................................................................................................................................
री पोस्ट होने के कारण कमेंट का विकल्प बंद है। आपने अभी तक पतंग नहीं उड़ाई तो मेरी पिछली पोस्ट की कविता 'पतंग' पढ़ कर आनंद ले सकते हैं...सादर।

12.1.12

पतंग

कटे बांस के
दो टुकड़ों संग
बंधी हुई डोरी।

मैं पतंग हूँ
उड़ना चाहूँ
उड़ा मुझे होरी।।

अरे ! संभल के
ठुमकी ठुमकी
नील गगन आया
ढील न इतना
खींच मुझे अब
फटती है काया

शातिर दुनियाँ
छूट ना जाए
अपनी यह जोरी।

एक न मानी
पेंच लड़ाई
सौतन से तूने
कटी मैं मगर
मेरी नज़र से
तू ही लगा गिरने

लगे लूटने
कई हाथ अब
मैं तो थी कोरी।
......................

8.1.12

बनारस के घाट और ब्लॉगर के ठाठ


जाड़े की कुनकुनी धूप तो वैसे ही सुखदायी होती है। गंगा का तट हो, बनारस के घाट हों और जेब में भुनी मूंगफली का थैला हो तो कहना ही क्या ! कदम अनायास ही बढ़ने लगे अस्सी घाट से दशाश्वमेध घाट की ओर। साथ में अस्सी निवासी शुक्ला जी भी थे। शुक्ला जी रह रह कर घाटों के बारे में अपनी जानकारी दे रहे थे और मैं उनकी जानकारी से बेपरवाह गंगा की लहरों, यात्रियों को लेकर आती-जाती नावों, विदेशी यात्रियों की चहल कदमियों, बच्चों के खिलंदड़पने और घाटों पर दिखने वाले अनगिनत रोचक दृश्यों को मुग्ध भाव से देखता, शुक्ला जी की बातें सुन सुन कर हाँ.. हूँ.. करता, मुंगफली छीलता, कुटकुटाता चला जा रहा था।

जब तुलसी घाट आया तो शुक्ला जी फिर शुरू हो गये... यह तुलसी घाट है। यहीं गुफा में बैठकर तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की रचना की थी। रामचरित मानस की हस्तलिखत पांडुलिपी तो चोरी हो गई लेकिन उनकी नाव और खड़ाऊँ अभी भी वहां ऊपर, हनुमान मंदिर में रखी हुई है। आपने तो अखबार...

हाँ शुक्ला जी ! ई तो हम जान ही गये हैं। तुलसी घाट आजकल समाचार पत्रों की सुर्खियों में है। यहां के हनुमान मंदिर से 450 वर्षों से भी अधिक समय से रखी रामचरित मानस की हस्तलिखित पाण्डुलिपी चोरी हो गई है। जनता मांग कर रही है पुलिस प्रशासन से। भारत सरकार का खुफिया तंत्र सक्रीय है। कुछ की गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं, तलाश जारी है। मगर वहां देखिये ...हम मफलर, टोपी, स्वेटर, जैकेट, लादे घूम रहे हैं और वे कैसे नंग धड़ंग कच्छा-लिंगोट पहने ठंडे पानी में कूदे जा रहे हैं !

हाँ ! इनकी तो यह रोज की दिनचर्या है। घाटों के किनारे रहने वाले बहुत से लोग रोज गंगा तट पर नहाते-धोते हैं। यहाँ की जुबान में इसे साफा-पानी लगाना कहते हैं।

हम अनवरत चले जा रहे थे और शुक्ला जी अपनी लय में घाटों की जानकारी दिये जा रहे थे..

तो मैं कह रहा था कि यह जो तुलसी घाट के बगल में भदैनी घाट है इसका महत्व इतना ही है कि यहां वो.. जो देख रहे हैं न ! विशाल पंपिंग सेट है। अब भले चुल्लू भर मिलने लगा है लेकिन किसी जमाने में यहीं से पूरे बनारस को पर्याप्त पानी की सप्लाई होती थी।      
क्यों ? महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म भी तो इसी मोहल्ले में हुआ था ?

हाँ, वह तो है लेकिन उस जमाने में अस्सी घाट का विस्तार असी नदी से भदैनी घाट तक था।

मतबल आप यह कहना चाहते हैं कि महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म आपके मोहल्ले में हुआ था ?

अरे नहीं..! भदैनी ही मान लीजिए। मैं यह नहीं कह रहा कि इस घाट का महत्व नहीं है लेकिन बनारस के लोग भदैनी घाट को लक्ष्मी बाई के नाम से नहीं इसी पंपिंग सेट के कारण जानते हैं ! जिससे पीने के पानी की सप्लाई होती थी।

वह देखिये शुक्ला जी ! बूढ़ा माझी कितनी मेहनत से कुछ सुलझा रहा है ! 10-12 साल का लड़का (शायद उसका नाती होगा) कितनी तनमयता से उनकी मदद कर रहा है ! वह कर क्या रहा है ?

वह मछली के जाल सुलझा रहा है। अपनी तैय्यारी में लगा है।  

यह माता आनंदमयी घाट है। माँ आनंदमयी की कर्मभूमि है। 1944 में माँ आनंदमयी ने अंग्रेजों से घाट की जमीन खरीदी और घाट तक एक आश्रम का निर्माण कराया। आज भी यहाँ कन्याएं संस्कृत का अध्ययन करती हैं। उनके लिए हॉस्टल बना है।

हूँ.....

इस कच्चे घाट को मीलिया घाट कहते हैं......

हूँ.....

यह वच्छराज घाट है। जिसे एक व्यापारी वक्षराज ने बनवाया...

हूँ........

यह जैन घाट है। इसका निर्माण जैनियों ने 1931 में कराया।

हूँ....

यह निषादराज घाट है। निषादराज घाट नाम इसलिए पड़ा कि इसके आसपास निषादों की बस्ती है।

हूँ....

यह प्रभु घाट है। इसका निर्माण बीसवीं शती के मध्य में बंगाल के निर्मल कुमार ने कराया।

हूँ...अब यहाँ धोबी कपड़े धोते हैं। वह देखिये शुक्ला जी! वहाँ लड़के गुल्ली डंडा खेल रहे हैं। जरा बचके रहियेगा, बड़ी तगड़ी टीम लग रही है। रूकिये ! देखते हैं। तभी एक कोरियन युवक बगल से गुजरा..फोटू हींचते हुए। उसे तश्वीर खींचते देख मुझे कैमरा न लाने का अफसोस हुआ और सारा दोष शुक्ला जी पर मढ़ दिया, बहुत बोर करते हैं शुक्ला जी ! जब घाट पर घूमना था तो अपना कैमरा लेकर आना था। वह इत्ती दूर से आकर फोटू हींच हींच कर मजे ले रहा है और आप हमें बनारस के घाटों का इतिहास भूगोल सुनाये जा रहे हैं। रूकिये !  हमी कुछ करते हैं.. मैने उस कोरियन युवक को पलट कर रोका...एक्सक्यूज मी...! वन स्नैप प्लीsss !” उसने मेरा आशय समझ कर कहा.....! व्हाई नॉट !!” उधर उस युवक ने कैमरा मेरी ओर किया इधर मैं झट से मूंगफली फोड़ते हुए घाट किनारे मुस्कुराते हुए पोज देकर खड़ा हो गया। क्लिक...! उसने फोटू दिखाया..भेरी नाइस ! वन मिनट ...टेक माई ई मेल एड्रेस...!! मे यू विल सेंड इट टू माई ई मेल...प्लीsss?” वह सुनकर खुश हो गया। खुशी से बोला... s !..आई प्रॉमिस। बट ऑफ्टर वन मंथ। आई हैव नो कम्प्यूटर हीयर। मैने उससे हाथ मिलाया और उसे धन्यवाद दिया, “ओके! ओके! थैंक यू । वह मुस्कुराता, हाथ हिलाता आँखों से ओझल हो रहा था और मैं सोच रहा था कि मौन तोड़ने पर, प्रेम से मिलने पर, अजनबी भी कैसे एक दूसरे से जुड़कर खुशी का अनुभव करते हैं !

इधर शुक्ला जी अपनी धुन में थे....यह चेतसिंह घाट है। यह जो घाट पर विशाल किला देख रहे हैं न ! इसका निर्माण काशी राज्य के संस्थापक राजा बलवंत सिंह ने कराया था। घाट और महल शिवाला मोहल्ले में है इसलिए इसे शिवाला घाट भी कहते हैं। 1781 में अंग्रेजों से युद्ध में हारकर काशी नरेश चेतसिंह किला छोड़कर भाग गये थे। तब से लगभग सवा सौ साल तक यह अंग्रेजों के अधीन रहा। फिर 19वीं शती के उत्तरार्द्ध में महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने यह किला पुनः प्राप्त कर लिया।

हूँ.....मैने किले को ध्यान से देखते हुए कहा, अभी भी कितना शानदार है ! सैकड़ों वर्षों से गंगा की बाढ़ झेल रहा है मगर जस का तस खड़ा है। बनारसी मस्ती की तरह इसने भी हार नहीं मानी। कित्ते ढेर सारे कबूतरों ने यहाँ अपने घर बना रखे हैं! आप जानते हैं इन जंगली कबूतरों को लोग गोला कबूतर कहते हैं।

शुक्ला जी बोले, इन्हें कोई नहीं पालना नहीं चाहता। ये बेवफा होते हैं, टिकते नहीं।

मैने कहा, नहीं शुक्ला जी ! यह हमारी फितरत है कि हम खूबसूरती के दीवाने हैं। जो खूबसूरत नहीं हैं उन पर आसानी से बेवफाई का आरोप मढ़ कर चल देते हैं जबकि मैं जानता हूँ कि ये सुफैद कबूतरों से अधिक स्वामिभक्त होते हैं। मैने एक गोला कबूतर को पालकर देखा है। उसकी कहानी फिर कभी सुनाउंगा। अच्छा ही है कि ये खूबसूरत नहीं हैं। आदमियों के कैद से दूर ये परिंदे कितने आनंद से खुली हवा में गंगा किनारे परवाज भर रहे हैं !”

शुक्ला जी जारी थे....मानो वे हमें आज बनारस के सभी घाटों का इतिहास भूगोल सुनाकर ही मानेंगे और हम सुनकर याद रखेंगे...! यह हनुमान घाट है। यहाँ 18 वीं शती का प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है। इसकी स्थापना गोस्वामी तुलसी दास ने की है। 16 वीं शती में बल्लभाचार्य ने यहीं निवास किया। यहाँ दक्षिण भारतीय  अधिक संख्या में रहते हैं।

वह देखिये शुक्ला जी...! यहाँ लड़के क्या मस्त क्रिकेट खेल रहै हैं। लगता है इनका मैच चल रहा है। रुकिये देखते हैं। बॉलर ने गेंद फेंकी और बैट्समैन ने जोर की शॉट मारी। गेंद हवा में उड़ती हुई पानी में गिरी..छपाक। सभी खिलाड़ी चीखे...ऑउट ऑउट. बॉलर खुशी के मारे चीखा..अउर मारा..भोंस...के ( अरे वही शब्द, जिसे 21 वीं शदी में शराफत से फिल्मों में चीख-चीख कर बॉस डी के कहा गया और शरीफ घरों के बच्चों ने भी खुल्लमखुल्ला शराफत से गाया।) ले लेहले छक्का..तोहें जान के ऐसन गेंद फेंकले रहली कि तू मरबा अउर मरते घुस जइबा ओकरे संगे  अपने बीली में। (..और मारो छक्का, मैने जानकर तुम्हें ऐसी गेंद फेंकी थी कि तुम मारोगे और  आउट हो जाओगे) यह पक्के बनारसियों कि खास विशेषता होती है। एक पंक्ति भी बिना गाली घुसेड़े नहीं बोल सकते। वे हमारी तरह शराफत का नकाब ओढ़कर मुँह नहीं खोलते, कलम नहीं चलाते। सीधे-सीधे गाली देते हैं। हम आगे बढ़े.....

यहाँ नागा साधुओं का प्रसिद्ध निरंजनी अखाड़ा है। इसलिए इस घाट का नाम निरंजनी घाट पड़ा।

हूँ.....वह देखिये शुक्ला जी। गज़ब ! उस साधू की तो सूंड़ की तरह लम्बी नाक है और एक ही आँख है !! कितना रंग रोगन पोते है ये साधू !!! ई खाता कैसे होगा ? मैने वहीं एक सीधे से दिखते आदमी से पूछा....का ई हमेशा यहीं रहलन? कहाँ से आयल हउवन?”  उसने कउवे की तरह चीखते हुए जवाब दिया... का मालिक ! रमता जोगी बहता पानी...एन्हने क कौनो ठिकाना हौ ! दुई दिना से दिखात हउवन, जब मन करी चल देहियें, कवन ठिकाना! रोजे इहाँ कौनो न कौनो मिला आवल करलन...।( क्या भाई साहब! चलते फिरते धूनी रमाने वाले साधू का कोई निश्चित स्थान होता है! दो दिन से दिख रहे हैं, जब मन करेगा चलते बनेंगे, इनका कौन ठिकाना ! यहां तो रोज ही कोई न कोई आते रहते हैं।) हम आँखे फाड़े उसे देखते हुए आगे बढ़े..। कैमरा न लाना वाकई खटक रहा था।

(जारी.....)
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