31.7.12

आइये मुंशी प्रेमचंद जी के गांव लमही चलें....

31 जुलाई 2012 से बनारस में तीन दिवसीय मुंशी प्रेमचंद लमही महोत्सव मनाया जा रहा है। आज लमही स्थित उनके आवास में विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये। मैने सोचा ब्लॉगर मित्रों को उनके गांव, पैत्रिक आवास की कुछ तस्वीरें दिखाई जांय और देखा जाय कि वहाँ वास्तव में हो क्या रहा है! सो पहुँच गया लमही गांव। पाण्डेपुर चौराहे से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित उनके गांव तक जाने वाली मुख्य सड़क बेहद खराब हाल में है। इस चौराहे से गुजरते वक्त इस चौराहे पर लगी आदमकद प्रेमचंद की मूर्ती का स्मरण हो आया जो फ्लाई ओवर निर्माण के दौरान उठा कर लमही भेज दी गई थी। इन रास्तों पर  चलते-चलते अहसास हो गया कि जन-जन के दुःख उकेरने वाले महान साहित्यकार के घर ही जा रहे हैं। बिना दर्द सहे उनके गांव के दर्शन भी कहाँ संभव है! :)


लमही जाने के मुख्य मार्ग पर बना है 
मुंशी प्रेमचंद स्मृति द्वार


द्वार के बायें बाजू में उनकी कथाओं के पात्रों की शानदार मूर्तियाँ


दायें बाजू में भी सुंदर मूर्तियाँ


मुंशी प्रेमचंद जी का पैतृक निवास स्थल


घर के आगे का कुआँ


दाईं तरफ से ली गई घर की तस्वीर


घर के पिछवाड़े स्थित तालाब


पैत्रिक घर के भीतर का दृश्य
ओह! चौराहे की मूर्ती का मलबा यहाँ सुरक्षित है।
इस घर में सभी कमरे खाली दिखे। 



पैत्रिक आवास के सामने स्थित नये आवास में स्थापित प्रतिमा
यहीं मनाया जा रहा है महोत्सव।


आज के समारोह में सम्मानित होने वाले वरिष्ठ साहित्यकार


साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों की भीड़


यहाँ खेले गये नाटक "बड़े भाई साहब" के पात्र


नाटक का एक दृश्य


दीवारों में ये तस्वीरें लगी दिखीं।


दरवाजे और खिड़कियाँ 



यहाँ भी उनकी कृतियों की तस्वीरें लगी थीं।


महोत्सव के शेष कार्यक्रम सांस्कृतिक संकुल में आयोजित होने हैं। बिजली फेल हो जाने के कारण इसे पोस्ट करने में देरी हुई। अभी क्रमशः लिखकर इसे पोस्ट किये देता हूँ।

25.7.12

मन आनंद से भर गया।




घर पहुँचने से पहले ही बारिश की फुहार शुरू हो गई। बारिश तेज हो जाने, भीग जाने और भीग कर बीमार पड़ जाने की चिंता ने बाइक की स्पीड तेज कर दी। तभी खयाल आया, रूक सकता नहीं, घर जल्दी पहुँचना ही है, बारिश तेज हो जायेगी तो भीगना तय है। क्यों न सावन की इस फुहार का आनंद लिया जाय!” बाइक की स्पीड धीमी हो गई। गरदन ऊपर किया तो चेहरे पर वर्षा की फुहारें पड़ने लगीं। अगले ही पल मेरा मन आनंद से भर गया।


यह कई वर्ष पहले की बात है। बारह घंटे की बस की यात्रा के बाद भी मेरा सफ़र अभी खत्म नहीं हुआ था। मंजिल अभी दो घंटे दूर थी। जिस्म थककर चूर हो चुका था और मस्तिष्क बोरियत का पहाड़ ढो रहा था। तभी  निगाह तेज धुन पर उछलते-कूदते खलासी पर पड़ी। हर स्टेशन पर जैसे ही बस धीमी हो कर रूकने लगती, बस का खलासी दरवाजे पर खड़ा हो, एक हाथ से लोहे के रॉड को पकड़े अपना पूरा जिस्म बाहर की ओर झोंकते हुए, आगे की मंजिल का नाम ले-लेकर चीखता। कुछ यात्रि रूकते, कुछ चढ़ जाते। बस आगे बढ़ती और वह फिर वैसे ही तेज धुन पर उछलने कूदने लगता। रूक-रूक कर ड्राइवर या कंडेक्टर से कुछ मजाक करता, जोर का ठहाका लगाता, फिर गरदन जोर जोर से हिलाते हुए उछलने कूदने लगता। उसे देखकर यह खयाल आया, एक यह है जो सफ़र की शुरूआत से ही खड़े-खड़े मस्ती से झूमते हुए चला आ रहा है, एक मैं हूँ जो बैठे-बैठे भी उकता चुका हूँ। चलना तो तय है फिर क्यों न सफ़र का आनंद लिया जाय !” अगले ही पल मन आनंद से भर गया। सफ़र की थकान मिट चुकी थी।   


दो बार ही नहीं, कई बार ऐसा महसूस किया है मैने। हालात को कोसा है, दुखी हुआ हूँ फिर अनायास खुशी से झूमने लगा हूँ। अकेले में, कभी सोचता हूँ इन बातों को तो लगता है मैं ही महामूर्ख हूँ ! जानता हूँ कि आनंद कहाँ है फिर भी रोता रहता हूँ ! कभी जल्दी ही संभल जाता हूँ, कभी कई दिन लगते हैं संभलने में। प्रश्न उठता है कि इतने सबक सीखने के बावजूद दुखी होता ही क्यों हूँ? क्यों नहीं बना लेता हमेशा-हमेशा के लिए आनंद को अपना दास ? काश ! मैं ऐसा कर पाता।

आप कह सकते हैं, आनंद को अपना दास बनाने के चक्कर में पड़ना ही क्यों ? खुद को ही आनंद का दास बना लो!” आनंद प्राप्ति के लिए यह सरल मार्ग है। जहाँ आनंद दिखे वहीं रम जाओ। जायज, नाजायज चाहे जैसे हो खूब मजे उड़ाओ। जेब में पैसे हों तो हाट-मॉल, सुरा-सुंदरी सभी तो आपकी सेवा में हाजिर हैं। जहाँ जैसे भी मिले लूट लो ! लेकिन मैं इस आनंद की बात नहीं कर रहा। यह तो क्षणिक है। इस मार्ग पर चलकर तो दुखों के महासागर में खो जाने की प्रबल संभावना है। मैं उस आनंद की बात कर रहा हूँ जो हमारे भीतर है। मैं उस दुःख की बात कर रहा हूँ जो हमारी सोच से बढ़ती-घटती है। इसके लिए किसी अतिरिक्त धन की आवश्यकता नहीं। इसके लिए किसी खास मेहनत की आवश्यकता नहीं। बस थोड़ा सा नज़रिया ही तो बदलना है! भीगने के भय से चिंतातुर होकर भी हमें भीगते हुए घर जाना है। हमने अपनी सोच थोड़ी सी बदली, बारिश की फुहारों का एहसास किया और अगले ही पल मन आनंद से भर गया। खलासी वही कर रहा है जो उसका काम है। वह चाहे तो कम पगार के लिए बस के मालिक को कोसते हुए भी सफ़र कर सकता है। वह चाहे तो अपनी छुट्टी और परिवार की चिंता करते हुए दुखी मन से भी सफ़र कर सकता है। लेकिन नहीं, वह खुशी-खुशी अपना काम करते हुए आनंद ले रहा है।  

प्रायः देखा जाता है, बॉस ने कोई अतिरिक्त काम सौंपा नहीं कि हमारा मूड-मिजाज़ गड़बड़ा जाता है। काम तो करना ही पड़ता है लेकिन हम काम करते वक्त पूरा समय अपने बॉस को कोसते हुए दुखी रहते हैं। वहीं अगर यह भाव आ जाये, हमारा परम सौभाग्य है कि हमारे बॉस ने हमें इस विशेष काम के लुए चुना। हमे इस अतिरक्त काम को बेहतर ढंग से करके दफ्तर में अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी है। नज़रिया बदलते ही काम करते वक्त बिताया गया वही समय आनंद से कट जाता है।

दिखता सरल है लेकिन यह आनंद सहज़ नहीं है। आनंद के इस मार्ग में विचार रूपी तिलस्मी दुनियाँ है। हमें विचारों के इस तिलस्म को यत्नपूर्वक तोड़ना है। दृढ़ प्रतिज्ञ रहना है। यह तभी संभव है जब हमारे हृदय में संतोष का भाव हो। ईश्वर के प्रति धन्यवाद का भाव हो। दूसरों के प्रति क्षमा का भाव हो। सहज स्वीकार्य की सकारात्मकता हो। सहज स्वीकार्य का यह अर्थ भी नहीं कि अन्याय को भी स्वीकार करते चले जाना है। अन्याय का विरोध करना भी हमारा धर्म है। हमे अपने धर्म से च्युत भी नहीं होना है लेकिन ऐसा करते वक्त अपने भीतर अहंकार को भी आश्रय नहीं देना है। अहंकार अकेले नहीं आता। जब आता है अपने साथ दुखों का पूरा कुनबा साथ लिये चलता है। अंहकार और सहृदयता के बीच का सतुंलन ही आनंद की प्राप्ति का मार्ग है। कभी-कभी यह सतुंलन सहज ही स्थापित हो जाता है, कभी अहंकार में डूबे नकारात्मक सोच को ही हम अपने ऊपर हावी होने देते हैं। यह कठिन है, मगर एक बार सध जाय तो मन आनंद से भर जाता है।

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नोटः इस पोस्ट की मजेदार बात यह है कि इसका आधा हिस्सा ब्लॉगिंग की देन है। पहले शुरू के तीन पैराग्राफ ही लिखे थे जिन पर मेरे कमेंट सहित कुल 27 कमेंट दर्ज थे। इसके बाद संतोष जी का मेल आया कि आपका यह आलेख बहुत अच्छा है। आप इसे मेल करके भेज दें तो इसे मैं 'जनसत्ता' तक पहुँचा दूँ। मैने भेज दिया। उन्होने कुछ समय बाद फोन किया कि थोड़ा छोटा है। थोड़ा और लिखिये। मैने उन्ही के कमेंट से शुरू करते हुए बात आगे बढ़ायी। लिखते वक्त कमेंट में आये विचार भी प्रभावित करते रहे और वे भाव भी आ गये जो कमेंट में दर्ज थे। इसीलिए लिख रहा हूँ कि इस पोस्ट का आधा हिस्सा ब्लॉगिंग की देन है। अब फाइनली बताइये कि कैसा है ?


ऊपर के तीन पैराग्राफ की चर्चा संतोष जी के माध्यम से आज दिनांकः 28-7-2012 को डेली न्यूज  में भी देखने को मिली।


यह लेख जनसत्ता में प्रकाशित है। 

22.7.12

एक शाम गंगा के नाम

बहुत दिन हुआ। चलिए आज आपको गंगा जी की सैर कराते हैं। आज रविवार का दिन था। दिन भर आराम किया तो सोचा शाम को चलें गंगा मैया का हाल चाल लें। सुना है गंगा मैया तेजी से बढ़ रही हैं। गत वर्ष तो इस समय तक खूब बढ़ चुकी थीं। गंगा बढ़ती हैं तो एक घाट से दूसरे घाट तक पैदल जाना संभव नहीं हो पाता। घाट किनारे की रौनक भी खत्म हो जाती है। यह हाल दो-चार दिन में ही हो जाने वाला है। घाटों के रास्ते बंद होने वाले हैं। आज भी चेत सिंह घाट के बाद सीढ़ी चढ़कर ही दूसरे घाट तक जा पाया। तो चलिए घाटों की सैर की जाय।

(1) यह तुलसी घाट के ऊपर से खींची गई तश्वीर है। शाम के समय घाटों पर दर्शनार्थियों की,  गगन में परिंदों की तथा नदी में नावों की हलचल बढ़ जाती है। चलिए नीचे उतर कर देखते हैं।


(2) एक मछुआरे(मछली पकड़ने वाला मल्लाह) का परिवार अपना 'जाल' सुलझाने में व्यस्त है। इन्हें मछली पकड़ने की चिंता है।



(3) लगता है मामला अधिक उलझ गया है। कौन पूछे ? बनारसी प्रायः अख्खड़ी होते हैं। सीधे-सीधे जवाब थोड़े न देंगे। सीधे कह देंगे.."तोहसे का मतलब? जा आपन काम करा ! मछली लेवे के होई तS काल भोरिये में आये।"


(4) यह दूसरे मछुआरे का परिवार है। नाव आती देख लपक कर पास पहुँचा कि देखें कितनी मछली पकड़ी है इसने! लेकिन एक भी नहीं दिखाई दी। लगता है खाली हाथ लौटा है यह परिवार। तभी तीनों बच्चे मायूस दिख रहे हैं।


(5)मछुआरे की चिंता से इतर यहाँ अलग ही मस्ती का आलम है। संडे की शाम क्रिकेट मैच का आयोजन लगता है। चारों ओर दर्शकों की भीड़ देखने लायक है। मैच खत्म होने के बाद जोरदार ढंग से विजयोत्सव मनाया गया और केदार घाट पर विजयी टीम के खिलाड़ियों की पूड़ी कटी।  


(6)यह घाट किनारे की दूसरी दुनियाँ है। जाड़ा, गर्मी, बरसात बच्चे ऐसे ही धमाल मचाते रहते हैं। गंगा सीढ़ियाँ चढ़ती जाती हैं ये बच्चे ऊपर और ऊपर की सीढ़ियों से गंगा में छलांग लगाते जाते हैं।


(7)चढ़ते उतरते थक गया तो सोचा चलो बैठ कर नावों की तश्वीरें खींची जांय। नदी में पानी बढ़ चुका है। धार तेज हो चुकी है लेकिन ये मल्लाह एक नाव में कितने लोगों को बिठाये गंगा की सैर करा रहा है! दूर उस बादल पर सूरज की किरणें पड़ रही होंगी तभी वह हल्का सुनहरा दिखाई दे रहा है।


(8)इस नाव में मालदार पार्टी लगती है। तभी यह नाव अधिक सुंदर और यात्री कम हैं। 


(9)मैं केदार घाट की आखिरी सीढ़ियों पर बैठा हूँ । केदार घाट की सुंदरता देख ये विदेशी चकित हैं। केदार घाट है ही खूबसूरत। उसकी तश्वीर तो आप यहाँ देख ही चुके हैं।


(10) दिन ढल रहा है। शाम हो रही है। घाट किनारे बत्तियाँ जलनी शुरू हो चुकी हैं। आज की गंगा सैर यहीं समाप्त करते हैं। अब नहीं लगता कि ऐसे घाट किनारे घूम-घूम कर आपको दो माह तक तश्वीरें दिखा पाऊँगा। पानी बढ़ते ही घाट पर आवागमन बंद हो जायेगा। पानी घटने के बाद भी बाढ़ द्वारा लाई गयी मिट्टी की सफाई होने तक घाटों पर पैदल आवागमन बाधित रहता है। हाँ, बाढ़ की तश्वीरें खींची जा सकती हैं। 


नोटः सभी तश्वीरें आज शाम की हैं। इसे उड़ाना चाहते हों तो उड़ा लें, कोई आपत्ति नहीं लेकिन बता जरूर दें ताकि मुझे खुश होने का मौका मिल जाय।:)

20.7.12

चिड़िया

घंटियों के ऊपर दाने की जुगत में बैठी चिड़िया। 


वर्षा के बाद धान के खेत में तृप्त और संतुष्ट चिड़िया।


उड़ती चिड़िया को पकड़ना क्या फोटू खींचना भी मुश्किल है। हाथ हिल गया और फोटो बर्बाद हो गया। :(


वहाँ जाकर चुपचाप पीठ दिखाकर बैठी है। जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया।


यह बड़ी निडर चिड़िया है। मेरे पास आने पर भी नहीं उड़ी। फोटो खींचने दिया मस्ती में। थैंक्यू चिड़िया...आई लव यू।


यह चिड़िया आज (21-7-2012) मिली 'मधुबन' में सोचा बिठा दूँ इसी पोस्ट में।



14.7.12

दो ब्लॉगर, दो कवि और एक काव्य गोष्ठी।

प्रसिद्ध कवि,  सम्मानित प्रकाशक और नौसिखिया ब्लॉगर पं0 उमा शंकर चतुर्वेदी 'कंचन' जी  के संकट मोचन स्थित आवास पर आज मास के द्वितीय शनिवार की शाम एक पावस कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ। एक तो अल्प सूचना ऊपर से रिम-झिम बारिश का परिणाम यह रहा कि मुझे लेकर मात्र चार कवि ही पहुँच पाये। मैं जब वहाँ पहुँचा तो 'कंचन' जी प्रकाशक की भूमिका में नज़र आये। अपने प्रकाशन की दो नवीनतम पुस्तकों को सरिया रहे थे। अभी इनका लोकार्पण भी नहीं हुआ है। मैने मौका ताड़ा और एक फोटू हींच लिया....



बायें-पं0 उमा शंकर चतुर्वेदी जी, बीच में प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री विंध्याचल पाण्डेय 'सगुन' तथा सबसे दायें वयोवृद्ध साहित्यकार हिंदी गज़ल के बेजोड़ बादशाह आदरणीय श्री परमानंद आनंद जी।

अपनी पुस्तकों को लेकर प्रकाशक महोदय खासे उत्साहित नज़र आये लेकिन एक भी पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं दी। मेरे आग्रह करने पर मुस्करा कर टाल गये। सब आप ही का है। अभी लोकार्पण नहीं हुआ है। मैने पुस्तकों की बंधी गठरियों के तश्वीर भीं खींच लिये। एक 'बेनीपुरी की साहित्य यात्रा' तो दूसरी भोजपुरी छंद में लिखी 'लव-कुश'। 'बेनीपुरी की साहित्य यात्रा' तो प्रसिद्ध पुस्तक है। यह विश्वविद्यालय प्रकाशन से भी प्रकाशित हो चुकी है। 'लव-कुश' बलिया के वयोवृद्ध कवि श्री तारकेश्वर मिश्र 'राही' का भोजपुरी में लिखा खण्ड काव्य है। दोनो पुस्तकें अच्छी लग रही थीं। पढ़ने के बाद इस पर प्रतिक्रिया देना उचित होगा।


पुस्तकें हटायी गयीं और मौसम और बनारस की खस्ताहाल सड़कों को कोसा गया जिनके कारण दूसरे कवि नहीं आ पाये। मैने अपना कैमरा कंचन जी के सुपुत्र को पकड़ा दिया और फोटो खींचने का आग्रह किया। आखिर हमारी भी फोटू आनी चाहिए कितनी दूसरों की ही खींचता रहूँ ? वयो वृद्ध कवि परमानंद आनंद का साथ अब कितने वर्षों का है कौन जाने भगवान उनको लम्बी उम्र दे। कविता के प्रति समर्पण का उनका यह भाव गज़ब का है जो इस मौसम में भी उन्हें यहाँ खींच लाया। वैसे मेरे पहुँचने तक बारिश रूक चुकी थी और बादलों  से  छन-छन कर प्रकाश कमरे में आ रहा था।


मेरी और 'कंचन' जी की कवितायें तो आप पढ़ते ही रहते हैं। विंध्यांचल पाण्डेय जी की कविता फिर कभी। गोष्ठी में सुनायी गई आनंद परमानंद जी की हिंदी गज़ल के कुछ अंश आपको पढ़ाता हूँ। परमानंद जी नेट से नहीं, सड़क से जुड़े हैं। ये कवितायें कवि का परिचय आपसे कराने में स्वयम् समर्थ हैं। कविता सुनाने से पहले परमानंद आनंद जी ने कहा...

आज तो  साहित्य का दौर इतना बेढंगा हो गया है कि कोई किसी को पूछने के लिए तैयार नहीं है। सब अपने लिये व्याकुल है, अपने लिये चिंतित है। ऐसे समय में कंचन जी का बुलावा बहुत अच्छा लगा। काव्य गोष्ठियाँ कविता की दृष्टि से., साहित्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी होती हैं और इनका  बहुत महत्व है। हम एक दूसरे की आलोचना, समालोचना करते हैं। इनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उन्होने सुनाया....

जिंदगी में जिस तरह हो संतुलन रख्खा करो
एक अच्छे आदमी का आचरण रख्खा करो।

हो अगर अच्छे, तो अच्छा और होने के लिये
गैर की अच्छाइयों का संकलन रख्खा करो।

प्यार मुश्किल है मगर बिलकुल असंभव है नहीं
अपने भीतर प्यार का तुम उपकरण रख्खा करो।

क्यों न सूरज-चाँद आंगन में तुम्हारे आयेंगे
अपने भीतर दूर तक निर्मल गगन रख्खा करो।

कौन किसका है यहां ! विश्वास  ये कैसे करूँ ?
तुम अगर अपने हो तो केवल स्मरण रख्खा करो।
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इस गज़ल में कवि की पीड़ा साफ झलकती है ः-


पुत्र जिनके श्लोक जैसे, बेटियाँ होतीं ऋचा
वे पिता-माता लगे वैदिक कथाओं की तरह।

प्यार तरुवर को धराशायी न करना आँधियों
हम लिपट कर जिनसे रहते हैं लताओं की तरह।

कौन सी अपनी दिशा होगी कभी सोचा नहीं
चार अपने पुत्र हैं चारों दिशाओं की तरह।

अपना संयोजन भी होगा ये कभी संभव नहीं
हम बहुत बिखरे दिंगबर की जटाओं की तरह।

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इस गज़ल में मध्यम वर्गीय परिवार की बेबसी के साथ-साथ समाज़ की उपेक्षा पर गहरा कटाक्ष भी हैः-

खेलते होंगे  कहीं जाकर उधर बच्चे मेंरे
वो खुला मैदान तट पर है जिधर बच्चे मेरे।

भूख में लौटा हूँ पैदल रास्ते में रोक कर
मांगते हैं सेव, केले ये मटर बच्चे मेरे।

साइकिल, छाता, गलीचे भी बनाना सीखलो,
काम देते हैं गरीबी में हुनर बच्चे मेरे।

भूख, बिमारी, उपेक्षा, कर्ज, महंगाई, दहेज
सोच ही पाता नहीं जाऊँ किधर बच्चे मेरे।

जंतुओं के दांत पंजों में जहर होता मगर,
आदमी की आँख में बनता जहर बच्चे मेरे

जो मिले खा-पी के सो जा, मत किसी का नाम ले,
कौन लेता है यहां, किसकी खबर, बच्चे मेरे।

संस्कृतियाँ जब लड़ीं सदियों की आँखें रो पड़ीं,
खण्डहर होते गये कितने शहर बच्चे मेरे।

यह बनारस है यहाँ तुम पान बनकर मत जिओ,
सब तमोली हैं तुम्हें देंगे कतर बच्चे मेरे।

तुम मेरे हीरे हो, मोती हो, मेरी पहचान हो,
मेरे सब कुछ, मेरे दिल, मेरे जिगर बच्चे मेरे।

गालियाँ गालिब, निराला भूख सहते थे यहाँ
यह कमीनों का बहुत अच्छा शहर बच्चे मेरे।

.................................................


10.7.12

सावन


गड़गड़ कड़कड़, घन उमड़ घुमड़
टिप् टिप् टिप् टिप् टिप् टिपिर टिपिर
धरती पर बूंदें गिरती हैं
झर झर झर झर, झर झरर झरर।

मन फर फर फर फर उड़ता है
तन रूक रूक छुक छुक चलता है
सावन की रिम झिम बारिश में
दिल धक धक धक धक करता है।

यादों की खिड़की खुलती है
इक सुंदर मैना दिखती है
पांखें फैलाती झटक मटक
तोते से हंसकर मिलती है।

वो लंगड़े आमों की बगिया
वो मीठे जामुन के झालर
वो पेंग बढ़ा नभ को छूना
वो चोली को छूते घाघर।

पर इंद्र धनुष टिकता कब है?
कुछ पल में गुम हो जाता है
मोती वाले पल मिलते हैं
चलना मुश्किल हो जाता है।

कुछ कीचड़ कीचड़ रूकता है
फिर एक कमल खिल जाता है
कुछ भौंरे गुन गुन करते हैं
दिन तितली सा उड़ जाता है।

……………………

इस गीत को अर्चना जी (मेरे मन की) के मधुर स्वरों में नीचे सुन सकते हैंः-



नोटः चित्र मनोज जी के ब्लॉग से उड़ाया हूँ।

5.7.12

सरकारी अनुदान



झिंगुरों से पूछते, खेत के मेंढक...

बिजली कड़की
बादल गरजे
बरसात हुयी

हमने देखा
तुमने देखा
सबने देखा

मगर जो दिखना चाहिए 
वही नहीं दिखता !

यार ! 
हमें कहीं, 
वर्षा का जल ही नहीं दिखता !


एक झिंगुर 
अपनी समझदारी दिखाते हुए बोला-

इसमें अचरज की क्या बात है !

कुछ तो 
बरगदी वृक्ष पी गए होंगे

कुछ 
सापों के बिलों में घुस गया होगा

मैंने 
दो पायों को कहते सुना है

सरकारी अनुदान
चकाचक बरसता है 
फटाफट सूख जाता है !

हो न हो
वर्षा का जल भी 
सरकारी अनुदान हो गया होगा..! 
.................................

नोटः यह एक पुरानी कविता है जिसे दो वर्ष पहले पोस्ट किया था। पुनः पोस्ट कर रहा हूँ। उन पाठकों के लिए जो मुझसे इधर जुड़े और जानता हूँ पुरानी पोस्ट कोई खंगाल कर नहीं पढ़ता।

( चित्र गूगल से साभार )

3.7.12

गंगा चित्र-8 (गंगा घाट के खेल)


पिछली पोस्ट में आपने बनारस के घाटों की तश्वीरें देखी और खूब सराहा। इसके लिए धन्यवाद। आज मैं आपको घाटों के कुछ और रंग दिखाना चाहता हूँ। तश्वीरें खूबसूरत नहीं हैं लेकिन इन तश्वीरों के माध्यम से जो कहना चाहता हूँ वह रोचक है। यहाँ तैराकी, नौकायन के अलावा बहुत से खेल भी खेले जाते हैं। जहाँ कहीं घाट पर चौड़े फर्श मिल गये घाट किनारे के युवक उसे खेल का मैदान बनाने में जरा भी देर नहीं करते। मौसम जाड़े का हो या गर्मी का, कोई फर्क नहीं पड़ता। जाड़े में दिनभर तो गर्मी में सुबह-शाम का समय खेलों के लिए सुहाना होता है। देखिये कुछ तश्वीरें....

(1) क्रिकेटः- घाट किनारे स्थान-स्थान पर क्रिकेट जमकर खेली जाती है। एक सर्वमान्य नीयम है। गेंद पानी में गयी तो आऊट। रबड़ की गेंदों से लगने वाले चौके-छक्के देखते ही बनते हैं।  क्रिकेट के अलावा गुल्ली-डंडा भी खूब खेला जाता है।


(2) बैटमिंटनः- यह गर्मी की एक सुबह है। घाट किनारे कितना खूबसूरत बैटमिंटन कोर्ट बनकर तैयार हो गया है!


(3)स्केटिंगः- यह राजेंद्र प्रसाद घाट की वह चिकनी फर्श है जिसमे बड़े-बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। गंगा महोत्सव के समय यह मंच खूब जगमग रहता है। कोई भी संगीतकार इस मंच पर अपनी प्रस्तुति देकर खुद को धन्य समझता है। पहली अप्रैल के दिन होने वाला प्रसिद्ध महामूर्ख सम्मेलन भी इसी मंच पर होता है। सामने घाट की सीढ़ियों पर बैठकर दर्शक आनंद लेते हैं। इस मंच को कितनी कुशलता से स्केटिंग का मैदान बना दिया गया है ! गर्मी की एक सुबह और स्केटिंग के जूते पहने हॉकी लिये गेंद को साधता एक युवक। तश्वीर भले सुंदर न हो लेकिन फर्श, युवक और सीढ़ियाँ देखकर आप अंदाज लगा सकते हैं कि यह कितना रोचक है।


(4) तास:-  खाली समय में जमाई जाने वाली 'तास' की अड़ी तो है ही।:)


(4) इन खेलों के अलावा गंगा को पवित्र करने के लिए भी कुछ  खेल चलता रहता है। घाट के फर्श का प्रयोग धोबी अपने कपड़े सुखाने के लिए भी जमकर करते हैं। जाड़े के समय खींची गई एक तश्वीरः-


(5) इस खेल को देखकर बताइये..अक्ल बड़ी या भैंस?



मजे की बात यह कि सभी कहते हैं... गंगा मैया की जय ! 


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1.7.12

गंगा चित्र-7


आज रविवार है। गंगा मैया के दर्शन किये बहुत दिन हुए। सोचा आज मार्निंग वॉक छोड़ गंगा वॉक किया जाय। खेल में शतरंज और घुमक्कड़ी में गंगा के घाट, ताजगी के मामले में दोनो का ज़वाब नहीं । जितनी बार भी गंगा जी गया एक नया एहसास, एक नई ताजगी लेकर लौटा हूँ। हर बार नये दृश्य देखने को मिलते हैं। आइये आज की कुछ ताजा तश्वीरें दिखाता हूँ...

(1) सुबह के साढ़े छ बज चुके हैं। सूर्योदय हो चुका है। नावें खुल चुकी हैं। पर्यटक सन राइज का आनंद लेकर  घाट किनारे बने लॉजों में लौटने की तैयारी में हैं। नदी किनारे तैयार हो रही नाव की बेचैनी समझी जा सकती है। कब तैयार हो और गंगा मैया की लहरों में घूमने का मजा मिले। 


(2) मढ़ी के ऊपर बिखरे दाने चुगते परिंदे।


(3) दशाश्वमेध घाट पर उमड़ी भक्तों की भीड़। आज कोई विशेष पर्व नहीं है। यह रोजमर्रा की जिंदगी है।


(4) केदार घाट के सामने दक्षिण भारतीय भक्त और दक्षिण भारतीय पंडा। मिनी भारत की छवि देखनी हो तो गंगा के घाटों का नज़ारा लीजिए। सभी धर्मों, संप्रदायों की मिली जुली संस्कृति का नजारा दिखेगा। शायद ही कोई राज्य हो जिसका प्रतिनिधित्व बनारस के घाट न करते हों।

(5) यह अनूठा दृश्य दिखा। दक्षिण भारतीय महिलाएँ और पुरूष दोनो सर मुढ़वा कर स्नान के बाद तैयार होते हुए।


(6) इन दो विदेशी युवतियों को शांत भाव से गंगा को निहारते देखा।


(7) लौटा तब भी ये लोग यहीं बैठे मिले।


(8) घाट किनारे बसे युवक तो रोज लेते ही हैं तैराकी का मजा।


(9) हरिश्चंद्र घाट के पास यह मुर्गा भी दिखा। मसान भूमि पर  इस मुर्गे के होने का रहस्य तो आलसी ही सही  ढंग से बता सकते हैं। कहीं यह किसी तांत्रिक की साधना का सामान तो नहीं!


स्थान. समय और फोटूग्राफर तो आप जान ही गये। दिनांक भी पोस्ट लिख ही देगा।..नमस्कार।