11.6.13

बारिश

फिर पसीना
पोछ कर
पढ़ने लगा
उनके शहर में
आज फिर 
बारिश हुई!

देखा है हमने
अपने शहर से
बादलों को
रूठकर जाते हुए 
औ. सुना है..
देखा है तुमने
बादलों को
झूमकर
गाते हुए!

कहो न!
क्या सच में 

तुम्हारे भी शहर में
बारिश हुई!


यार! 
बिजली भी नहीं
अपने शहर में
इनवर्टर बुझ जाये कब
पता नहीं है
तपता रहा
धूप में

दिन भर यहाँ
उतार कर
फेंके हुए शर्ट से
श्वेत चकत्ते
हँस रहे
मुझ पर
झर रहे हैं
स्वेद कण
अब भी

और तुम
लिखते हो कि
मौसम सुहाना है!

झूठ मत बोलो, बताओ
क्या सच में
तुम्हारे ही शहर
बारिश हुई!


यार!
जब बारिश हुई तो क्या, 

सूँघ पाये
उस सोंधी सुगंध को
जो निकलती है धरा से
पहली बारिश में!
महसूस भी कर पाये 
खुशबू जरा सी
जो बिखरती है हवा में
बाट जिसकी जोहते थे
पागलों की तरह
हर साल हम!

क्या
भीग पाये बारिश में?
या 
ओढ़ छाता
खरीद कर
आलू-नेनुआ
डांटते हुए बच्चों को
घुस गये
घर में
बाबूजी की तरह!

झूठ लगती हैं मुझे 
बातें तुम्हारी
भीगे नहीं होगे 
तुम अभी, पूरी तरह
देखकर छींटे जरा सी
चीखते हो क्यूँ?
आज मेरे शहर
बारिश हुई!

फिर पसीना
पोछ कर
पढ़ने लगा
उनके शहर में
आज फिर
बारिश हुई!
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5.6.13

पाक गईल अमवाँ कि ना..?

चखे लागल छोटकी चिरैय्या!
मैय्या देखा तनि, पाक गईल अमवाँ कि ना..?

चार बूँद झरल बाटे अबहिन ले मुनियाँ
चार जून रूका तनि बरसे दs बुनियाँ
अमवाँ पाक जाई हो.....

भिनसहरे दाना-पानी चिरिया के देवलू
खाई के मोटाई गइल, बाज़ अस कोयलू
मैय्या देख तनि, पाक गइल अमवाँ कि ना..? 

पकलका पे हक होखे चिरिया कs पहिला
काहे घबरालू बिटिया, तोहें मिली डलिया
अमवाँ पाक जाई हो.....

काहे हक होखे पहिला चिरिया कs माई?
हम ताकत बाटी, सब कचवे ई खाई!
मैय्या देखा तनि, पाक गइल अमवाँ कि ना..?

मनई से पहिले रहल चारो ओरी जंगल
शेर, भालू, चिरई कs होत रहल दंगल
अमवाँ पाक जाई हो....

बूझ गइली माई काहे चिरिया कs हक बा
ओनहीं के पेड़ हउवे, ओनहीं क फल बा!
चिरई चखा तोहीं, पाक गइल अमवाँ कि ना..?

चखे लागल छोटकी चिरैय्या!
मैय्या देखा तनि, पाक गइल अमवाँ कि ना..?
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1.6.13

शतरंज

खिलाड़ी
समय और अवसर देखकर
बिछा देते हैं बिसात
सजा देते हैं मोहरे
फूँक देते हैं प्राण
बांट देते हैं अधिकार
और
चलने लगते हैं
अपनी-अपनी चालें!

मोहरे
मंत्रमुग्ध हो
लड़ने-झगड़ने लगते हैं आपसे में
कटने-मरने लगते हैं एक-दूसरे से
और
अंततः
नहीं जान पाते
कि वे
खुद कभी नहीं खेलते
मगर हमेशा
यही समझते रहते हैं
कि वे ही खेल रहे हैं!

खिलाड़ी
खेल खत्म होते ही
हाथ मिलाने के बाद
हँसते हुए
ढूँसकर भर देते हैं सबको
एक बंद डिब्बे में
दूसरे खेल तक के लिए।

इस खेल में
मोहरे बराबर होते हैं
ताकत बराबर होती है
निर्धारित रहता है
युद्ध का क्षेत्रफल
और
तय रहते हैं
क़ायदे-क़ानून।

जब कोई
राजनीति से इसकी तुलना करने लगता है
तो मुझे
अच्छा नहीं लगता।
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